सागर में आस्था का अद्भुत संगम: पुरव्याऊ टौरी पर 122 सालों से जीवंत है 'कांधे वाली काली' की अनूठी परंपरा, मशाल की रोशनी में भक्त कंधों पर बैठाकर देते हैं मां को विदाई
20 October 2026 • 08:32 am

मध्य प्रदेश के सागर शहर में शारदीय नवरात्रि और दशहरे के पावन पर्व पर आस्था, भक्ति और प्राचीन संस्कृति का एक ऐसा अद्भुत नजारा देखने को मिलता है, जो पूरे देश में अपनी एक अलग पहचान रखता है। शहर के ऐतिहासिक पुरव्याऊ टौरी क्षेत्र में पिछले 122 वर्षों से 'कांधे वाली काली' माता की स्थापना की अनूठी और गौरवशाली परंपरा अनवरत रूप से निभाई जा रही है। इस आयोजन की सबसे बड़ी और खास विशेषता यह है कि आधुनिक युग में जहां बड़ी-बड़ी झांकियां वाहनों और ट्रकों पर निकाली जाती हैं, वहीं यहां आज भी श्रद्धालु माता रानी की विशाल प्रतिमा को अपने कंधों पर बैठाकर ही पंडाल में स्थापना के लिए लाते हैं और दशहरे पर विदाई के समय भी कंधों पर ही सवार कराकर विसर्जन के लिए ले जाते हैं। इस भव्य विसर्जन जुलूस के सबसे आगे पारंपरिक मशाल (पलीता) चलती है, जो इस यात्रा को और भी अलौकिक बनाती है।
अंग्रेजी हुकूमत के दौर में वर्ष 1905 से शुरू हुआ था यह ऐतिहासिक सिलसिला
इस प्राचीन परंपरा के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए श्री सार्वदेशिक दुर्गा महोत्सव समिति, पुरव्याऊ टौरी के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह राजपूत ने बताया कि देश की आजादी से बहुत पहले अंग्रेजी शासनकाल के दौरान वर्ष 1905 में हीरासिंह राजपूत द्वारा पहली बार यहां माता की स्थापना की गई थी। आयोजकों के अनुसार, उस दौर में आज की तरह आवागमन के लिए वाहनों और बिजली की व्यवस्था नहीं हुआ करती थी। ऐसे में उनके पूर्वजों ने अपार श्रद्धा के साथ माता को अपने कंधों पर बैठाकर लाने और विसर्जन के लिए ले जाने की शुरुआत की थी। साथ ही, रात के अंधेरे में उजाले की व्यवस्था करने के लिए प्रतिमा की स्थापना से लेकर विसर्जन जुलूस तक आगे-आगे मशाल यानी पलीता जलाकर चलने की प्रथा शुरू हुई, जिसे 122 साल बीत जाने के बाद भी आज की पीढ़ी पूरी निष्ठा के साथ निभा रही है।

मां अभव्या परिवार द्वारा तैयार किया जाता है श्रृंगार, पहनाए जाते हैं 122 साल पुराने आभूषण
पुरव्याऊ टौरी पर मां देवी की स्थापना मुख्य रूप से महिषासुर मर्दिनी के दिव्य स्वरूप में की जाती है। इस भव्य दरबार में माता के साथ भगवान श्री गणेश, माता महालक्ष्मी, मां सरस्वती और भगवान कार्तिकेय की प्रतिमाएं भी विराजमान रहती हैं। आयोजकों के मुताबिक, माता रानी की इस मनमोहक प्रतिमा के निर्माण और उनके श्रृंगार से जुड़ी एक और विशेष बात यह है कि इसके लिए बाजार या बाहर से कोई भी सामान नहीं खरीदा जाता है। माता के वस्त्र, मुकुट, जेवर और अन्य सभी श्रृंगार सामग्री मां अभव्या के परिवार के सदस्यों द्वारा ही अपने हाथों से तैयार की जाती है। प्रतिमा निर्माण में किसी भी प्रकार के कृत्रिम केमिकल (रसायन) का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता है। इतना ही नहीं, माता रानी को आज भी 122 वर्ष पुराने पारंपरिक पायजेब और विशेष मराठी साड़ी पहनाकर सजाया जाता है।
'चल माई काली माई' के जयकारों से गूंज उठता है पूरा सागर शहर
नवरात्रि के पूरे नौ दिनों तक माता की इस अद्भुत झांकी के दर्शन करने के लिए प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। दशहरे के पावन अवसर पर जब माता का भव्य विसर्जन चल समारोह निकलता है, तो केवल सागर जिले से ही नहीं, बल्कि आसपास के कई जिलों से भी लाखों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने के लिए सागर पहुंचते हैं। जब भक्त माता को अपने कंधों पर उठाकर निकलते हैं, तो पुरव्याऊ टौरी से लेकर तीनबत्ती, कटरा बाजार और राधा तिगड्डा तक का पूरा मार्ग भक्तों की भारी भीड़ से खचाखच भर जाता है और समूचा शहर 'चल माई काली माई' के गगनभेदी जयकारों से गुंजायमान हो उठता है।

